जानिए, आखिर कैसे डाॅलर के मुकाबले रुपये की कीमत 71 रुपये पर पहुंच गई

जानिए, आखिर कैसे डाॅलर के मुकाबले रुपये की कीमत 71 रुपये पर पहुंच गई

इकोनॉमिक्स

जानिए, आखिर कैसे डाॅलर के मुकाबले रुपये की कीमत 71 रुपये पर पहुंच गई  भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक चौकाने वाली खबर आज आई, जब डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 71.25 रुपये के स्तर पर पहुंच गई। इस उछाल से पहले कुछ ही समय बीता था जब रुपये की कीमत 70 रुपये के स्तर पर पहुंच गई थी। ये भारत के इतिहास में रुपये की सबसे बड़ी गिरवाट है लेकिन क्या आप जानते हैं कि वो कौन से कारण हैं जिनकी वजह से रुपये की कीमत कम या ज्यादा होती है। आपको ये जानकर भी हैरानी होगी कि साल 1947 में 1 डॉलर की कीमत 1 रुपये के बराबर थी। फिर ऐसा क्या हुआ कि पिछले 70 सालों में रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले लगातार लुढ़कती चली गई। तो चलिए रुपये के उस सफर पर जो साल 1947 से लेकर अब तक ढलान पर है। इस सफर में हम आपको बताएंगे उन कारणों के बारे में भी जिनकी वजह से किसी देश की करेंसी की कीमत कम या ज्यादा होती है।

जब पहली बार कम हुई रुपये की कीमत 

देश के आज़ाद होने से पहले भारत की इकॉनमी पर ब्रिटिश राज का प्रभाव था। यही वजह थी, जब साल 1947 में देश आजाद हुआ तो भारत के 1 रुपये की कीमत 1 डॉलर के बराबर थी। लेकिन भारत में आज़ादी के बाद आए राजनीतिक और आर्थिक बदलावों के चलते रुपये की चाल धीरे- धीरे कमज़ोर होती चली गई। असल में आज़ादी के वक़्त भारत पर किसी तरह का कोई कर्ज़ा नहीं था। लेकिन भारत को आगे बढ़ने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। लेकिन जब भारत ने साल 1951 में पहली पंच वर्षीय योजना चालू की तो भारत को विदेशों से कर्ज़े की ज़रूरत पड़ी। जिसकी वजह से भारत सरकार को पहली बार रुपये की कीमत को कम करना पड़ा। रुपये की कीमत को कम करने की मुख्य वजह थी, फॉरेन इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देना और साथ ही साथ एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना ताकि फॉरेन रिज़र्व को बढ़ाया जा सके।

इसे एक उदाहरण से समझते हैं- भारत के रुपये की कीमत कम होगी तो अमेरिका में बैठा इंसान भारत से ज्यादा चीज़े खरीद पायेगा। यही कारण है कि एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए कोई भी देश अपनी करेंसी की वैल्यू को कम कर देता है। आज़ादी के बाद भारत ने फिक्स्ड एक्सचेंज रेट सिस्टम अपनाया। इस सिस्टम के तहत सरकार तय करती थी कि भारत के रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले क्या रखी जायेगी। इस सिस्टम की वजह से 1948 के बाद डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 4.79 पैसे के आस पास हो गई।

जंग के दौर में खस्ताहाल हुई हालत

फिर आया 1962 और 1965 की जंग का दौर। इस जंग के बाद खस्ताहाल हुई भारत की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारत सरकार को फिर से मजबूरन रुपये की कीमत को डी वैल्यू  करना पड़ा। जिसकी वजह से 1 डॉलर की कीमत 7.57 पैसे पर पहुंच गई। असल में उस वक्त भारत को विदेशी मुल्कों से हथियार खरीदने पड़े। जिसकी वजह से फॉरेन रिज़र्व में कमी आ गई। फॉरेन रिज़र्व को मजबूत करने के लिए भारत को फिर रुपये के कीमत को डी वैल्यू करना पड़ा।

साल 1971 में भारतीय रुपये का लिंक ब्रिटिश पाउंड से खत्म कर दिया गया और रुपये को सीधा डॉलर के साथ जोड़ दिया गया। जिसके बाद साल 1975 तक रुपया डॉलर के मुकाबले लुढ़ककर 8.39 रुपये हो गया और साल 1985 आते- आते 1 डॉलर की कीमत 12 रुपये तक हो गई थी। फिर आया साल 1991 जो भारत की अर्थव्यवस्था पर काफी भारी पड़ा। बेतहाशा महंगाई और विकास की धीमी गति ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी और भारत का फॉरेन रिज़र्व लगभग सूख चुका था। इस फॉरेन रिज़र्व के भंडार को ज़िंदा रखने के लिए सरकार को फिर से रुपये की कीमत को डी वैल्यू करना पड़ा। जिसकी वजह से साल 1991 में 1 डॉलर की कीमत 17.90 रुपये पर पहुंच गई।

सरकार और आरबीआई की सभी कोशिशे हुईं नाकाम

डॉलर के रेट को स्टेबल करने की सरकार की सभी कोशिशें जवाब दे चुकी थीं। जिसके बाद सरकार ने साल 1993 में फिक्स्ड एक्सचेंज रेट की जगह फ्लेक्सिबल एक्सचेंज रेट की पॉलिसी अपना ली यानि अब डॉलर की कीमत बाज़ार तय करने वाला था। लेकिन इस नए सिस्टम में आपात स्थिति में डॉलर के रेट को स्टेबल करने के लिए आरबीआई के हाथ में कुछ पावर भी दे दी गईं। इस पॉलिसी के बाद रुपये की कीमत में काफी गिरावट आई। अब 1 डॉलर में बदले 31.37 रुपये चुकाने पड़ रहे थे। इसके बाद रुपये की बाकी बची हुई मजबूती भी कम होती चली गई और साल 2010 आते- आते डॉलर 45 रुपये पार कर चुका था।

इसके बाद डॉलर ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और साल 2013 तक एक डॉलर की कीमत 63 रुपये पार कर चुकी थी और आज साल 2018 में मोदी सरकार और आर बी आई कि तमाम कोशिशों के बावजूद 1 डॉलर की कीमत 71 रुपये पर पहुंच चुकी है। असल में रुपये की कीमत कई बातों पर निर्भर करती है। जैसे महंगाई, रोज़गार, ब्याज दर, ग्रोथ रेट, व्यापारिक घाटा, इक्विटी मार्केट में उतार चढ़ाव, विदेशी मुद्रा रिज़र्व और ऐसे ही और भी कई फैक्टर्स हैं जो रुपये को कमज़ोर और मजबूत बनाते हैं।

सारा खेल फॉरेन रिज़र्व का

इसे थोड़ा आसानी से समझते हैं। असल में ये सारा खेल फॉरेन रिज़र्व का है। अगर किसी देश में फॉरेन रिज़र्व ज्यादा है तो उस देश की करेंसी मजबूत होती है और वही अगर किसी देश के फॉरेन रिज़र्व में कमी आती है तो उस देश की करेंसी की कीमत में भी कमी आएगी। फॉरेन रिज़र्व जुड़ा होता है इंपोर्ट और एक्सपोर्ट से। जो देश इम्पोर्ट ज्यादा करता है यानि बाहर से सामान ज्यादा खरीदता है, उसका फॉरेन रिज़र्व कम हो जाता है। जिसकी वजह से उसकी करेंसी की वैल्यू भी कम हो जाती है। वहीं अगर कोई देश एक्सपोर्ट ज्यादा करता है यानि बाहर ज्यादा सामान बेचता है, तो उसके देश में फॉरेन करेंसी ज्यादा आती है। जिससे फॉरेन रिज़र्व बढ़ता है जिससे उस देश की करेंसी की कीमत में भी बढ़ोत्तरी होती है। मगर इसमें भी सरकार को बैलेंस बना कर चलना पड़ता है। क्योंकि अगर किसी देश की करेंसी मजबूत होगी तो बाहर तो बाहरी देश उससे सामान कम खरीदेंगे। जिससे एक्सपोर्ट में कमी आती है।

उदाहरण- मान लीजिए एक डॉलर की कीमत 50 रुपये है तो अमेरिका का बिज़नेसमैन जो भारत से माल खरीदता है वो 1 डॉलर देकर कम चीजें खरीद पायेगा। वहीं 1 डॉलर की कीमत अगर 60 रुपये हो जाती है तो वो ज्यादा माल खरीद पायेगा। अब ये तो हुई इम्पोर्ट एक्सपोर्ट की बात। अब बात करते हैं आर बी आई के इंटरेस्ट रेट की। अगर डिपॉज़िट पर इंटरेस्ट रेट हाई होगा तो विदेश से लोग ज्यादा इन्वेस्ट करेंगे और वहीं इंटरेस्ट रेट कम होगा तो फॉरेन इंटरेस्ट में भी कमी आएगी।

कच्चे तेल की कीमतों ने भी लगाई आग

आज की बात करें तो रुपये में आई कमज़ोरी का सबसे बड़ा कारण है कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें। जिसकी वजह से सरकार को विदेशी करेंसी में ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे फॉरेन रिज़र्व में कमी आ रही है। दूसरा कारण है करंट एकाउंट डेफिसिट यानि चालू खाता घाटा। जो कि 2019 तक 2.5% की दर से बढ़ने का अनुमान है। करंट एकाउंट डेफिसिट होने का मतलब है कि इम्पोर्ट के लिए की गई पेमेंट्स एक्सपोर्ट से मिले पैसे से ज्यादा है। जिसका सीधा मतलब है फॉरेन रिज़र्व में कमी आना और रुपये की वैल्यू में गिरावट। इंटरनेशनल मार्किट में डॉलर की बढ़ती डिमांड भी रुपये के कमजोर होने का अहम कारण है।

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Written by Suniti

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